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Sunday, September 25, 2022

भूत की कहानी : आत्मा की सवारी | Aatma Ki Savari Story In Hindi

फैजाबाद जिले की एक रात की बात है। वहां के घाट रेलवे स्टेशन में कई सारे ऑटो ड्राइवर खड़े थे। सभी सवारी आते ही एक-एक करके उन्हें बैठाते और चले जाते थे। जैसे ही रात ज्यादा होने लगी ज्यादातर ड्राइवर अपने घर को चले गए। उसी रात दुर्गेश ऑटो ड्राइवर भी घाट रेलवे स्टेशन पर था, वो भी दूसरे ड्राइवरों की तरह घर जाने ही वाला था। तभी उसे याद आया कि एक पेसेंजर ट्रेन आने वाली है। दुर्गेश और तीन-चार ऑटो चालक उसी पेसेंजर ट्रेन के इंतजार में रुक गए।

तभी जोर-जोर से बारिश होने लग गई। रात तो थी ही, लेकिन बादलों की वजह से चांद की रोशनी भी नजर नहीं आ रही थी। बादल गरजते और बिजली चमकती तो कुछ उजाला नजर आता, वरना अमावस्या से भी ज्यादा काली रात हो गई थी।

कुछ ही देर में पेसेंजर ट्रेन आई। दुर्गेश को ट्रेन से एक खूबसूरत सी लड़की उतरती हुई दिखी, जिसके कंधे पर एक बैग और हाथ में एक सूटकेस था। वो लड़की सीधे दुर्गेश के पास गई और कहने लगी कि मुझे रामपुर जाना है। दुर्गेश ने कहा कि अभी बहुत रात हो रही है, इसलिए 700 रुपये किराया लगेगा। अगर आप सुबह जाएंगी, तो मैं 200 रुपये में ही छोड़ दूंगा।

लड़की ने जवाब दिया, “मुझे अभी जाना है। आप ले चलिए, मैं पैसे दे दूंगी।”

दुर्गेश ने कहा, “मैडम, आप पहले पैसे दे दीजिए। मैं आपको सही सलामत घर तक छोड़ दूंगा।”

लड़की बोली, “अभी मेरे पास सिर्फ 300 रुपये हैं। आप ये रख लीजिए। घर पहुंचते ही आपको बचे हुए 400 रुपये दे दूंंगी।”

इतना सुनते ही दुर्गेश ने कहा, “ठीक है मैडम! आप ऑटो में बैठ जाइए।”

कुछ ही देर में दुर्गेश ने उस लड़की को उसके घर के पहुंच पहुंचा दिया। वो लड़की ऑटो से उतरी और घर के अंदर चली गई। दुर्गेश अपने 400 रुपये के इंतजार में खड़ा रहा। आधा घंटा बीत गया, लेकिन लड़की लौटकर नहीं आई।

दुर्गेश के मन में हुआ कि अंदर जाकर देख लेता हूं कि वो अबतक क्यों नहीं आई।

उसने घर की घंटी बजाई और जोर-जोर से आवाज लगाने लगा। तभी एक बुढ़िया ने घर का दरवाजा खोला।

दुर्गेश ने उससे कहा कि एक मैडम यहां ऑटो से आई थीं। उन्होंने मेरे 400 रुपये देने हैं, वो अबतक पैसे लेकर बाहर नहीं आईं।

बुढ़िया ने हैरानी से पूछा, “कौन मैडम? यहां तो मैं और मेरे पति के अलावा और कोई नहीं रहता। हां, मेरी बेटी पहले रहती थी, लेकिन वो पांच सालों से यहां नहीं रह रही है।”

दुर्गेश बोलने लगा, “क्यों अब वो कहा रहती है? मैंने शायद आपकी ही बेटी को यहां तक छोड़ा है। आप एक बार अच्छे से देखिए।”

बातों-ही-बातों में दुर्गेश की नजर सामने दीवार पर गई। वहां उसी लड़की की तस्वीर लगी हुई थी, जिसे वो ऑटो में बैठाकर लाया था।

दुर्गेश ने बुढ़िया से पूछा, “वो दीवार पर जिसकी तस्वीर लगी है, वो आपकी बेटी है?”

बुढ़िया ने जवाब दिया, “हां, वो ही मेरी बेटी है। क्यों क्या हुआ? तुम ऐसे क्यों पूछ रहे हो?”

हां, जवाब सुनते ही दुर्गेश बोल पड़ा, “माता जी मैंने कहा था न कि मैं आपकी बेटी को ही घर लाया हूं। यही मेरे साथ ऑटो में बैठकर आई थीं। आप अब जल्दी से मेरे पैसे दे दीजिए। देखिए, सुबह भी हो गई है। मैं कबसे यही खड़ा हूं।”

बुढ़िया ने दुखी मन से कहा, “बेटा, ऐसा नहीं हो सकता। हां, ये मेरी बेटी है, लेकिन पांच साल पहले ये ट्रेन के नीचे आकर मर चुकी है। इसे तुम कैसे घर ला सकते हो।”

ये सुनते ही दुर्गेश के होश उड़ गए। वो तेजी से वहां से भागा। जैसे ही वो ऑटो के पास पहुंचा, तो देखा कि उसकी सीट में चार सौ रुपये रखे हुए थे।

उसने वो पैसे भगवान के सामने रखे और मंत्र का जाप करते हुए आगे की ओर बढ़ गया। उसके मन में हुआ कि आज तो सवारी बैठाने और पेसेंजर ट्रेन के लालच में मेरी जान जाते-जाते बची है। उस दिन से दुर्गेश ने रात को ऑटो चलाना ही बंद कर दिया। वो सिर्फ दिन के समय सवारी लाता व ले जाता और रात को घर में आराम से सोता है।

कहानी से सीख :

दिन में काम करने के साथ ही रात को आराम करना भी उतना ही जरूरी होता है। नहीं तो ज्यादा लालच भारी पड़ सकता है।

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